Friday, 2 September 2011

चेहरा !

ये दर्द का कुहासा हटे तो,
चेहरा तेरा देखूं ज़रा ,
आँखों की नमी सूखे तो ,
तेरी छवि निहारूं  ज़रा !

वैसे तो बंजर पड़ी थी ,
अरसे से मन की ज़मीन ,
याद के बादल छटें तो ,
नयी फसल बोऊँ ज़रा !

ये दर्द का कुहासा हटे तो,
चेहरा तेरा देखूं ज़रा ,

यूँ तो हर बरस बुलाती रहीं ,                                             
पपीहे की पुकार भी ,
मैं ही अनमना रहा ,
डूबा सा, अपने गुमान में !

ये दर्द का कुहासा हटे तो,
चेहरा तेरा देखूं ज़रा ,



कब मिलोगी ?

पूछा ज़िन्दगी ने ,'ख़ुशी' से,
कहो, कैसे आना हुआ ?
आज कहीं और, दिल लगा नहीं ,                             
या, इत्तेफाकन  गुज़रना हुआ ?

अधीर प्रेमी सा, पूछा फिर से,
कभी - कभी मिलोगी ?
या अक्सर  मिलती रहोगी ?
या देश के नेता की तरह ,
चुनाव होते ही , रस्ता  भूलोगी ?

बड़ी शर्मिंदा हुई, कहा, गलती हुई ,
अबकी  बार  न  जाऊँगी ,
नेता  जी  चाहे  आयें  न आयें ,
मैं  भ्रष्टाचार की तरह, 
अपनी धूनी यहीं  जमाऊँगी !

उसी  दिन से दोस्तों -

भ्रष्टाचार ख़ुशी संग रहने लगा ,
आम आदमी फिर से ,
दुःख  के 'भवसागर' में उतर गया,
संवेदनहीन  सरकार से लड़ने , 
जीवन  के अन्न शन पर बैठ गया  !






Thursday, 1 September 2011

चाँद

एक घर जो धरती से दूर हो  ,
मगर, हर दिल अज़ीज़ हो ,
न पूनम, न अमावस का हिसाब रहे ,
बस , थके बोझिल से क़दमों को ,हल्का करे , 
चाँद पर ऐसा ही एक घर बने !