ये दर्द का कुहासा हटे तो,
चेहरा तेरा देखूं ज़रा ,
आँखों की नमी सूखे तो ,
तेरी छवि निहारूं ज़रा !
वैसे तो बंजर पड़ी थी ,
अरसे से मन की ज़मीन ,
याद के बादल छटें तो ,
नयी फसल बोऊँ ज़रा !
ये दर्द का कुहासा हटे तो,
चेहरा तेरा देखूं ज़रा ,
यूँ तो हर बरस बुलाती रहीं ,
पपीहे की पुकार भी ,
मैं ही अनमना रहा ,
डूबा सा, अपने गुमान में !
ये दर्द का कुहासा हटे तो,
चेहरा तेरा देखूं ज़रा ,