Wednesday, 31 August 2011

कांटे !

बनो गुलाब का फूल , ख़याल  अच्छा है,
बनो महक गुलशन की, बहुत उम्दा  है !
माली की आहट तो पहचानती है खुशबू भी,
रहो सजग, रख लो कांटे भी कुछ साथ ,
दरिन्दे बढ़ाते हैं अब हाथ, पहन कर दस्ताने !





नया सफ़र !

चार कोस चल कर जीवन के,
जाने क्यूँकर थम गया सफ़र !
अभी अभी तो ज़ाहिर हुए हैं ,
जीवन के खट्टे मीठे अनुभव !


चार कोस चल कर जीवन के,
जाने क्यूँकर थम गया सफ़र !

कभी चांदनी, कभी धूप में,
निखरा संवरा है  मेरा रूप प्रखर ,
मरुस्थल में पनपे हैं  चटकीले,
फूल कैक्टस  के इधर उधर !

चार कोस चल कर जीवन के,
जाने क्यूँकर थम गया सफ़र !


जो होता केवल चलते जाना,
जीने  का केवल मूल अर्थ,
समय, स्वयं में जीवन होता ,
रचती प्राणी क्यूँ कुदरत इतने ,यत्न कर !


चार कोस चल कर जीवन के,
जाने क्यूँकर थम गया सफ़र !


पाकर सन्देश एक बीज से पनपा,
वृक्ष  कैसा ये सुंदर जीवन का,
निरंतर बहे यह स्रोत प्रेम का,
ऐसा मन्त्र  कानों में कहते जाना !


चार कोस चल कर जीवन के,
जाने क्यूँकर थम गया सफ़र !



मुक्त स्वर में गाता है पंछी,
सुनो ये उसका  गीत नया !
नींद से तुम्हें जागता  कोई,
सुनो ये उसका सन्देश नया !

सोये रहे विषयों के आसन पर,
बंद किये प्रेम के द्वार झरोखे ,
दीप ज्ञान के जलाता कोई,
देखो उसका रूप नया !

मुक्त स्वर में गाता है पंछी,
सुनो ये उसका  गीत नया !

तपती रेत में छाया मांगे ,
सागर में दो पग भूमि,
आसमान में जीवन ढूंढे, 
धरती का भटका प्राणी !

मुक्त स्वर में गाता है पंछी,
सुनो ये उसका  गीत नया !

भूख नहीं है दो रोटी की, लेकिन ,
सोने चांदी के टुकड़े मांगे ,
दौड़ रहा मन इसके उसके सबके पीछे,
चलने का भी अभी ज्ञान नहीं !


मुक्त स्वर में गाता है पंछी,
सुनो ये उसका  गीत नया !



सत्ता के गलियारों में ,
रचे रोज प्रपंच नया ,
अधिकारों का होता चीर हरण ,
अधर में भीष्म का असमंजस खड़ा !

मुक्त स्वर में गाता है पंछी,
सुनो ये उसका  गीत नया !

जगो, उठो, जला लो दीप गगन में,
एक सूरज है कम, भर लो आग स्वयं में,
खुद के जीने के पल हैं बहुतेरे,
आज जियो मातृभूमि के लिए ज़रा !

मुक्त स्वर में गाता है पंछी,
सुनो ये उसका  गीत नया !

कितने भी हों तेरे संगी साथी,
पथिक, तू फिर भी अकेला है !

हर पीड़ा, हर हर्षित पल का,
साक्षी , तू अकेला है !
न समझ सके कोई तेरे अंतर्द्वंद को ,
तू ही कौरव , पांडव भी तू है ,
स्वयं से विजयी पराजित  होने वाला ,
सैनिक तू अकेला है !

कितने भी हों तेरे संगी साथी,
पथिक,  तू फिर भी  अकेला है !

राजमहल के वैभव छोड़े 
दुःख के कितने कारण खोजे ,
तर्क वितर्क के जंगल में ,
मन का बीज अकेला है ,
अनुयायियों की असंख्य भीड़ में भी,
गौतम बुद्ध अकेला है !

कितने भी हों तेरे संगी साथी,
पथिक,  तू फिर भी  अकेला है !

जीते हों कितने भी महाभारत,
संग में योद्धा हों या महानायक ,
कुंडल कवच हो या, 
कुशल सारथी परिचायक ,
अपनों की भरी सभा में,
द्रौपदी सा विवश , अकेला है !

कितने भी हों तेरे संगी साथी,
पथिक,  तू फिर भी  अकेला है !




पुरुषोत्तम की संगिनी सहचरी हो,
धरती की पाली पोसी हो ,
कितने जतन से व्रत तप जिए हों,
पग पग परीक्षा में सफल हुई जो,
सीता का हर पक्ष अकेला है !

कितने भी हों तेरे संगी साथी,
पथिक,  तू फिर भी  अकेला है !

जितनी जल्दी हो खोल बंध ये,
नाग पाश अति विषैला  है,
सुन्दर सहज मन को हरने वाला ,
स्वर्ण मृग सा छलावा है ,
अंत समय में दशानन सा ,
यथार्थ भूमि पर गिरने वाला,
हर अहंकार खोखला है !

कितने भी हों तेरे संगी साथी,
पथिक,  तू फिर भी  अकेला है !





Monday, 29 August 2011

तू भी सावन बन !

दर्द की भारी चादर,
जिसे ओढ़ लेते हैं,
हम अक्सर,
ढकने अपने ज़ख्म....

और, भर लेते हैं भीतर अपने,
जाने अनजाने,
न जाने कितने,
अर्थहीन उबलते लावे !

आसमान लेकिन -
बाँहे फैलाये , लेता समेट,
धरती के आक्रोश से,
निष्कासित कुछ बेबस,
बूंदों में भीगे, बीते पल !

अपने अंश से बिछुड़ी,
व्याकुल हो उठती , धरती
स्वागत करती पुनः वसुंधरा ,
फैला कर ममता का आँचल !

Sunday, 28 August 2011

सात समुंदर !

प्रिये ! जो होते बस सात समुंदर ,
पलक झपकते आ जाती मैं ,
रिश्ते  नातों के गहरे उथले पथ  ,
पल भर  में तय कर  जाती  मैं !

होते कैसे भी घने , अँधेरे,
कितने भी होते निर्जन रस्ते ,
बन सहचरी छवि की तुम्हारी ,
मीरा बन , बन बन गाती मैं !

कल कल बहती नदी बन कर,
कितने भी पाषणों से लड़ जाती मैं ,
तुम्हारे जीवन के खारेपन को हरने ,
अपना  अस्तित्व भूल जाती मैं !

पर ये तो मन के विषम प्रश्न थे,
मैं ठहरी अनपढ़ मूढ़ मति ,
कलैदिओस्कोप के मिटते बनते ,
अजीब  चेहरे , कैसे पढ़ पाती मैं !

प्रिये ! जो होते बस सात समुंदर ,
पलक झपकते आ जाती मैं ....





वो कौन है जो,
निरंतर , निर्विघ्न,
निर्झर .....
मेरे अंतर में बहता है !

एक भाव गंगा - सा,
अक्सर लहर बन कर,
मेरे मौन को तोड़ता है !

कोई कलश बन जाऊं,
भर सकूँ उसका 
खालीपन !

समेट लूं उसे ,
एक बार फिर,
काया के तार तार होते,
नपे तुले आँचल में !

सजग मृग - सी, 
उसकी आहट लेती हूँ ,
वह कुशल धावक सा ,
दौड़ जाता है ,
अनंत की ओर !


वो कौन है जो,
निरंतर , निर्विघ्न,
निर्झर .....
मेरे अंतर में बहता है !