कितने भी हों तेरे संगी साथी,
पथिक, तू फिर भी अकेला है !
हर पीड़ा, हर हर्षित पल का,
साक्षी , तू अकेला है !
न समझ सके कोई तेरे अंतर्द्वंद को ,
तू ही कौरव , पांडव भी तू है ,
स्वयं से विजयी पराजित होने वाला ,
सैनिक तू अकेला है !
कितने भी हों तेरे संगी साथी,
पथिक, तू फिर भी अकेला है !
राजमहल के वैभव छोड़े
दुःख के कितने कारण खोजे ,
तर्क वितर्क के जंगल में ,
मन का बीज अकेला है ,
अनुयायियों की असंख्य भीड़ में भी,
गौतम बुद्ध अकेला है !
कितने भी हों तेरे संगी साथी,
पथिक, तू फिर भी अकेला है !
जीते हों कितने भी महाभारत,
संग में योद्धा हों या महानायक ,
कुंडल कवच हो या,
कुशल सारथी परिचायक ,
अपनों की भरी सभा में,
द्रौपदी सा विवश , अकेला है !
कितने भी हों तेरे संगी साथी,
पथिक, तू फिर भी अकेला है !
पुरुषोत्तम की संगिनी सहचरी हो,
धरती की पाली पोसी हो ,
कितने जतन से व्रत तप जिए हों,
पग पग परीक्षा में सफल हुई जो,
सीता का हर पक्ष अकेला है !
कितने भी हों तेरे संगी साथी,
पथिक, तू फिर भी अकेला है !
जितनी जल्दी हो खोल बंध ये,
नाग पाश अति विषैला है,
सुन्दर सहज मन को हरने वाला ,
स्वर्ण मृग सा छलावा है ,
अंत समय में दशानन सा ,
यथार्थ भूमि पर गिरने वाला,
हर अहंकार खोखला है !
कितने भी हों तेरे संगी साथी,
पथिक, तू फिर भी अकेला है !