वो कौन है जो,
निरंतर , निर्विघ्न,
निर्झर .....
मेरे अंतर में बहता है !
एक भाव गंगा - सा,
अक्सर लहर बन कर,
मेरे मौन को तोड़ता है !
कोई कलश बन जाऊं,
भर सकूँ उसका
खालीपन !
समेट लूं उसे ,
एक बार फिर,
काया के तार तार होते,
नपे तुले आँचल में !
सजग मृग - सी,
उसकी आहट लेती हूँ ,
वह कुशल धावक सा ,
दौड़ जाता है ,
अनंत की ओर !
वो कौन है जो,
निरंतर , निर्विघ्न,
निर्झर .....
मेरे अंतर में बहता है !
अति सुंदर अभिव्यक्ति,अंतर्मन के एहसास को बहुत ही सुंदर शब्दो से कविता में उतारा है आपने :)
ReplyDeleteSpeechless..I am...
ReplyDeleteThank you Vandana and Jagdish :)
ReplyDeleteBE A1 OM ( . ) Kaun hain jo Sapnon Mein aaya , kaun hain jo MaN Mein Samaaya , lo jhuk gaya aasmaan bhi , saath apne naya rang laaya , Oh jiya a a a a a ! _/*\_ ALLAH AMEN Z0
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