Monday, 29 August 2011

तू भी सावन बन !

दर्द की भारी चादर,
जिसे ओढ़ लेते हैं,
हम अक्सर,
ढकने अपने ज़ख्म....

और, भर लेते हैं भीतर अपने,
जाने अनजाने,
न जाने कितने,
अर्थहीन उबलते लावे !

आसमान लेकिन -
बाँहे फैलाये , लेता समेट,
धरती के आक्रोश से,
निष्कासित कुछ बेबस,
बूंदों में भीगे, बीते पल !

अपने अंश से बिछुड़ी,
व्याकुल हो उठती , धरती
स्वागत करती पुनः वसुंधरा ,
फैला कर ममता का आँचल !

1 comment:

  1. BE A1 OM ( . ) Saawn ka maheena , pawan kare shor , jiyarare jhoomein aisa , jaise ban ma naache mor ! _/*\_ ALLAH AMEN Z0

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