Wednesday, 31 August 2011

नया सफ़र !

चार कोस चल कर जीवन के,
जाने क्यूँकर थम गया सफ़र !
अभी अभी तो ज़ाहिर हुए हैं ,
जीवन के खट्टे मीठे अनुभव !


चार कोस चल कर जीवन के,
जाने क्यूँकर थम गया सफ़र !

कभी चांदनी, कभी धूप में,
निखरा संवरा है  मेरा रूप प्रखर ,
मरुस्थल में पनपे हैं  चटकीले,
फूल कैक्टस  के इधर उधर !

चार कोस चल कर जीवन के,
जाने क्यूँकर थम गया सफ़र !


जो होता केवल चलते जाना,
जीने  का केवल मूल अर्थ,
समय, स्वयं में जीवन होता ,
रचती प्राणी क्यूँ कुदरत इतने ,यत्न कर !


चार कोस चल कर जीवन के,
जाने क्यूँकर थम गया सफ़र !


पाकर सन्देश एक बीज से पनपा,
वृक्ष  कैसा ये सुंदर जीवन का,
निरंतर बहे यह स्रोत प्रेम का,
ऐसा मन्त्र  कानों में कहते जाना !


चार कोस चल कर जीवन के,
जाने क्यूँकर थम गया सफ़र !



1 comment:

  1. BE A1 OM ( . ) Jo raah chuni tune , usi raah pe raahi chalte jaana re , ho kitni bhi lambi raah , are ho , ho kitni bhi lambi raah , diya ban jalte jaana re , usi raah pe raahi chalte jaana re ! _/*\_ ALLAH AMEN Z0

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