Sunday, 28 August 2011

सात समुंदर !

प्रिये ! जो होते बस सात समुंदर ,
पलक झपकते आ जाती मैं ,
रिश्ते  नातों के गहरे उथले पथ  ,
पल भर  में तय कर  जाती  मैं !

होते कैसे भी घने , अँधेरे,
कितने भी होते निर्जन रस्ते ,
बन सहचरी छवि की तुम्हारी ,
मीरा बन , बन बन गाती मैं !

कल कल बहती नदी बन कर,
कितने भी पाषणों से लड़ जाती मैं ,
तुम्हारे जीवन के खारेपन को हरने ,
अपना  अस्तित्व भूल जाती मैं !

पर ये तो मन के विषम प्रश्न थे,
मैं ठहरी अनपढ़ मूढ़ मति ,
कलैदिओस्कोप के मिटते बनते ,
अजीब  चेहरे , कैसे पढ़ पाती मैं !

प्रिये ! जो होते बस सात समुंदर ,
पलक झपकते आ जाती मैं ....





2 comments:

  1. Bahut accha.....aap to age hi badte ja rahe ho......

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  2. BE A1 OM ( . ) Saat samandar paar main tere peechche peechche aa gaya ! Waise tho , Advait mein saat samundar milkar ek hothe hain aur koyi aage peechche nahin hotha ! _/*\_ ALLAH AMEN Z0

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