प्रिये ! जो होते बस सात समुंदर ,
पलक झपकते आ जाती मैं ,
रिश्ते नातों के गहरे उथले पथ ,
पल भर में तय कर जाती मैं !
होते कैसे भी घने , अँधेरे,
कितने भी होते निर्जन रस्ते ,
बन सहचरी छवि की तुम्हारी ,
मीरा बन , बन बन गाती मैं !
कल कल बहती नदी बन कर,
कितने भी पाषणों से लड़ जाती मैं ,
तुम्हारे जीवन के खारेपन को हरने ,
अपना अस्तित्व भूल जाती मैं !
पर ये तो मन के विषम प्रश्न थे,
मैं ठहरी अनपढ़ मूढ़ मति ,
कलैदिओस्कोप के मिटते बनते ,
अजीब चेहरे , कैसे पढ़ पाती मैं !
प्रिये ! जो होते बस सात समुंदर ,
पलक झपकते आ जाती मैं ....
Bahut accha.....aap to age hi badte ja rahe ho......
ReplyDeleteBE A1 OM ( . ) Saat samandar paar main tere peechche peechche aa gaya ! Waise tho , Advait mein saat samundar milkar ek hothe hain aur koyi aage peechche nahin hotha ! _/*\_ ALLAH AMEN Z0
ReplyDelete