Sunday, 28 August 2011

वो कौन है जो,
निरंतर , निर्विघ्न,
निर्झर .....
मेरे अंतर में बहता है !

एक भाव गंगा - सा,
अक्सर लहर बन कर,
मेरे मौन को तोड़ता है !

कोई कलश बन जाऊं,
भर सकूँ उसका 
खालीपन !

समेट लूं उसे ,
एक बार फिर,
काया के तार तार होते,
नपे तुले आँचल में !

सजग मृग - सी, 
उसकी आहट लेती हूँ ,
वह कुशल धावक सा ,
दौड़ जाता है ,
अनंत की ओर !


वो कौन है जो,
निरंतर , निर्विघ्न,
निर्झर .....
मेरे अंतर में बहता है !




4 comments:

  1. अति सुंदर अभिव्यक्ति,अंतर्मन के एहसास को बहुत ही सुंदर शब्दो से कविता में उतारा है आपने :)

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  2. Thank you Vandana and Jagdish :)

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  3. BE A1 OM ( . ) Kaun hain jo Sapnon Mein aaya , kaun hain jo MaN Mein Samaaya , lo jhuk gaya aasmaan bhi , saath apne naya rang laaya , Oh jiya a a a a a ! _/*\_ ALLAH AMEN Z0

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